सुरकंडा माता मंदिर: पौराणिक कथा, धार्मिक महत्व और कैसे पहुंचें?

शक्ति पीठ या सिद्द पीठ ऐसे स्थान हैं जहां देवी शक्ति रुपा देवी का निवास है। सुरकंडा देवी ऐसे ही शक्ति पीठों में से एक सिद्द पीठ है। जो उत्तराखंड में स्थित है। इस आर्टिकल में हम बात करेंगे सुरकंडा देवी मन्दिर के बारे में। कहां हे सुरकंडा देवी का मंदिर? सुरकंडा देवी की क्या कहानी है? कैसे जा सकते हैं सुरकंडा देवी के मन्दिर? आज इस आर्टिकल में आपको सभी जानकारी मिलेगी।

सुरकंडा देवी मन्दिर कहाँ है?

51 शक्ति पीठों में से एक सुरकंडा देवी मन्दिर उत्तराखंड राज्य के टिहरी जिलें में स्थित जौनपुर के सुरकट पर्वत पर धनौटी और कान्हा ताल के बीच में घने जंगलों में पहाड़ कि सबसे उंची चोटी पर स्थित है। ये मन्दिर दुर्गा मां के नौ रुपों में से एक को सर्म्पित है। इस मन्दिर के उत्तर में आपको हिमालय पर्वत का सुन्दर दृश्य देखने को मिलेगा।

सुरकंडा देवी मन्दिर परिसर से बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और युमनोत्री चारो धामो की पहाड़िया नजर आती हैं। जिनकी बजह से ये और अधिक पवित्र तीर्थस्थल हो जाता है। कहा जाता है कि मां का मयका चम्बा के जड़धार गाँव में है। इसी गांव के लोग मन्दिर की देख रेख करते हैं। विभिन्न अवसरों पर मां की पूजा अर्चना भी इन्ही लोगों के द्वारा की जाती है।

सुरकंडा देवी मन्दिर का उल्लेख केदारखंड और स्कंदपुराण में भी मिलता है। इस मंदिर में आपको देवी काली की मूर्ति भी देखने को मिल जायेगी। गंगा दसहरे और नवरात्रों को यहां आने के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है। इसी कारण से आपको इन त्योहारों पर आपको यहां हजारो श्राधालुओं की भीड़ देखने को मिल जायेगी।

मां सुरकंडा देवी की कहानी

यह कहानी सतयुग की है। एक बार प्रजापति दक्ष के द्वारा एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया गया। इस यज्ञ में राजा दक्ष ने भगवान शंकर और मां सती के अलावा सभी को आमंत्रित किया था। सभी देवी देवता कनखल में आयोजित यज्ञ में जाने लगे। यह देखकर मां सती का मन विचलित होने लगा। मां ने भगवान शंकर से यज्ञ में जाने के लिए अग्रह किया कि हे प्रभु वो तो मेरा स्वंय का घर हे वहां जाने के लिए हमें किसी भी निंमत्रण की कोई अवश्यकता नहीं है। हम वहां विना निमंत्रण के भी जा सकते हैं।

भगवान शंकर ने मां सती से कहा कि बिना निमंत्रण हमें कहीं भी नहीं जाना चाहिए। इसलिए मैं आपको वहाँ जाने कि आज्ञा नहीं दे सकता। भगवान शंकर के मना करने का बाद भी देवी अपने आप को उस यज्ञ में जाने से न रोक सकीं और कनखल की ओर प्रस्थान कर दिया। यज्ञ स्थान पर पहुंचने पर उनका स्वागत उनकी मां प्रसूति के अलावा किसी ने नहीं किया। देवी ने देखा कि उस यज्ञ में देवी सती और उनके पति भगवान शिव के अलावा सभी का स्थान है, तो उन्होनें अपने पिता से इसका कारण पूंछा।

इस पर उनके पिता ने उनका और उनके पति का अपमान करते हुए कुछ शब्द कहे। अपने पति भगवान महादेव का अपमान सुनकर देवी सती को क्रोध आ गया। उसी समय देवी ने यज्ञ कुंड में झलांग लगा दी और स्वंय की ऊर्जा से ही स्वंय को भस्म कर दिया। जैसे ही ये बात भगवान शिव ने सुनी वो क्रोधित हो उठे और अपने रौद्र रुप में आ गये। मां सती को गोद में उठाकर वो संसार में भ्रमण करने लगे।

भगवान शंकर के रौद्र रुप को देखकर पूरी सृष्टि में हाहकार मच गया। देवता सहायता के लिए भगवान विष्णु के पास गये। भगवान विष्णु ने अपने सुर्दशन चक्र से माता के पार्थिव शरीर को 51 भागों विभाजित कर दिया। जो अगं पृथ्वी पर जिस जगह गिरा वो एक सिद्ध पीठ कहलाया। देवी सती का सिर जिस स्थान पर गिरा उसे आज सुरकंडा देवी सिद्ध पीठ के नाम से जाना जाता है।

सुरकंडा देवी मंदिर कैसे पहुंचे

दिल्ली से मां सुरकंडा देवी मन्दिर जाने के लिए 3 साधन उपलब्ध हैं। आप स्वंय की कार या टैक्सी से जा सकते है, आप ट्रेन से जा सकते हैं या फिर आप बस से भी जा सकतै है।

पहले बात कर लेते हैं स्वंय की कार या टैक्सी से जाने की इसके लिए आपको नेशनल हाईवे 334 से जाना होगा ये मेरठ, मुजफ्फरनगर, रुड़की होते हूए हरिद्वार और ऋषिकेश तक जाता है। ऋिषिकेश से आप नरेंद्रनगर, चंबा और कनताल के रास्ते से कद्वदूखाल ताक जायेंगे। कद्दूखाल ही वो जागह हे जहां तक आपकी गाड़ी जा सकती है वहां से आपको पैदल ही जाना पड़ेगा।

अब बात कर लेते हैं बस सेवा कि तो दिल्ली के कशमीरी गेट से या आनंन्द बिहार से आपको सीधे देहरादून या हरिद्वार के लिए बस मिल जायेगी। वहां से आप लोकल ट्रांसपोर्ट से जा सकते हैं।

तीसरा और आखिरी रास्ता है ट्रैन से दिल्ली के आनंद बिहार स्टेशन से आपको सीधे देहरादून, ऋिषिकेश या हरिद्वार के लिए ट्रेन मिल जायेगी। वहां के स्टेसन से आप टैक्सी या बस से आगे का सफर तय कर सकते हैं।

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